कल्पनापूरा संग्रह

रचना 559 / 789

उसने मुझे सिखाया कि एक *शुक्रिया* कह देने भर से उम्मीद लौट…

उसने मुझे सिखाया कि एक *शुक्रिया* कह देने भर से उम्मीद लौट आती है । मरे मन की *मिलते ही उसने कहा ...तुम्हारी हँसी मैंने कहा ....तुम्हारी आँखें नमी पसंद रूहें ... फिर कुछ नहीं बोली सिवा *शुक्रिया* के। *तस्वीर मेरी favourite है 😊

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह