कल्पनापूरा संग्रह

रचना 566 / 789

एक रोज़ लड़के ने कहा

एक रोज़ लड़के ने कहा.... मुझे तुममें आग दिखती है। लड़की सोच में पड़ गई । मुस्कुराई और चुपचाप लौट गई। लड़के की जब तंद्रा टूटी तो वो लड़की को पुकारने लगा । तभी एक सूखा पत्ता उड़ कर लड़के के पैर के पास पड़ गया। लड़के को लगा जैसे कोई आवाज़ दे रहा। लड़के ने झुककर पत्ता उठाया तो पाया कि कुछ अक्षर उस पर डोल रहे। उसने हाथ की ओट देकर सारे अक्षर बिछा दिए। मुझे दुख है तुम मुझमें आग देखते हो। मैं राख हूं । कभी उसे स्पर्श करने का ....देखने मलने का मन बने तो आवाज देना। यहीं हूं। न लड़की दिख रही थी न राख। आग दिख रही थी भीतर कहीं बहुत भीतर कुछ देर बाद ..... लड़का भी दिखना बंद हो गया। हवस और हवादिस की बातें....कौन सुने?

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