कल्पनापूरा संग्रह

रचना 579 / 789

प्रेम खुद किस्मत के दरवाजे से रोज़ उदास लौटता है

प्रेम खुद किस्मत के दरवाजे से रोज़ उदास लौटता है और प्रेमी हैं कि उससे सदके ,दुहाई ,इल्म की आस करते हैं। इन लौटती सीढ़ियों पर बैठे हुए उसने उस रोज़ कुछ भी नहीं कहा। पर मैंने सुना.... उदासी कुछ नहीं होती पर उसका स्वाद होता। गंध होती है । देख होती है । ध्वनि होती है । छुअन होती है। प्रेम का क्या है वो तो वैसे भी कहीं नहीं रहता। कहीं का नहीं रहता।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह