बस प्रेम में संभव है ऐसा अथाह विस्तार ।
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बस प्रेम में संभव है ऐसा अथाह विस्तार । लिपि, भाषा,स्पर्श और संवेदना का सार। ठीक जैसा मैं तुम्हारे नाम के तीन मनकों में सिमट जाती हूं। तुम्हारी अनुपस्थिति से भी बरबस लिपट जाती हूं।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह