कल्पनापूरा संग्रह

रचना 588 / 789

प्रेम एक अजीब विवशता है।

प्रेम एक अजीब विवशता है। एक खूबसूरत रेंगता घोंघा प्रेम साँझा उगता है..... उसकी दी उदासियाँ दो पृथक पृथक जगहों पर गिरती हैं। वहीं पनपती हैं। दो प्रेमिल पल पल पीपल होते रहते हैं। प्रेम दिवस मुबारक रहे।

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