कल्पनापूरा संग्रह

रचना 594 / 789

किसी रोज़ जब कोई न होगा और कुछ न बचेगा

किसी रोज़ जब कोई न होगा और कुछ न बचेगा न पाने को न खोने को । जानती हूं तुम आओगे उन तमाम खामोशियों, चुप्पियों और प्रतीक्षाओं को दरकिनार कर अपना सारा प्रेम बुहार कर मुझे संजोने को एक बार फिर मेरा होने को।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह