कल्पनापूरा संग्रह

रचना 598 / 789

अक्सर लगता है कोई मुझे पुकार रहा

अक्सर लगता है कोई मुझे पुकार रहा ... उठकर तुम्हारे लिखे को छूती हूं तो पाती हूं आवाजें आना बंद हो गई। मैं महक जाती हूं तुम्हारे कहे में। तुम बिना आए कितना तो पहुंच जाते हो मुझ तक । बस अभी फिर शब्दों का स्पर्श मिला । तुम तक भी पहुंचती है क्या मेरी कोई मूक प्रेम पंक्ति सौंधी सौंधी संदली संदली कभी कभी।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह