कल्पनापूरा संग्रह

रचना 599 / 789

काश प्रेम के माथे पर भी उभर आता कोई घाव का निशान टूट कर

काश प्रेम के माथे पर भी उभर आता कोई घाव का निशान टूट कर जिस रोज़ दुखता कोई प्रेमी रूठती कोई प्रेमिका पर प्रेम जादूगर निकला हर बार टूट को गायब करता रहा घाव पर गुलाब रखता रहा प्रेमी खरगोश और प्रेमिका चिड़िया होती रही । दिल धड़कते रहे सदियों तलक। तस्वीर २०१३ की है।पुराने हम तस्वीर में बचे रहते हैं।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह