कल्पनापूरा संग्रह

रचना 603 / 789

मेरे भीतर का प्रेम मौन सिर्फ़ तुम्हारा है । तुम्हारे भीतर क…

मेरे भीतर का प्रेम मौन सिर्फ़ तुम्हारा है । तुम्हारे भीतर के सारे वाचाल प्रश्न मेरे हैं। *तुमने कहा मेरे पास दूरियाँ हैं। मैंने सुना ज्यादा पास आना असल में है दूर जाना। *तुमने कहा तुम्हें अपने कदमों पर वश नहीं। मैंने सुना मत कहो। मुझे आवाज़ से उलझन होती है। *तुमने कहा आसमान चाँद सूरज उगाने के लिए है। प्रेम का मचान न लगाओ। मैंने सुना मेरे लिए होंठ मत जलाया करो।तुम्हारा मुझे बनाना ही बिगाड़ देना है। *तुमने कहा कायम रहो। दूर बहुत दूर मैंने सुना उदासी सबसे खूबसूरत फूल है। तुम पर अच्छा लगता है। *मैंने कहा अच्छे तो हो न? तुम ने सुना पर शायद मुझे अनसुना रखा रहने दिया। तुम मुस्कुराते रहे । मुझपर सफ़ेद बर्फ़ चुप्पी की पड़ती रही देर तक साल दर साल। मुझ पर अब ब्रह्मकमल खिला रहता है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह