कल्पनापूरा संग्रह

रचना 609 / 789

लिखना खुद में फ़फ़ूँद उगाने जैसा है ।

लिखना खुद में फ़फ़ूँद उगाने जैसा है । खुद के ऐसे हिस्से को आसरा देना जो दुखता हो , व्यर्थ हो पर अपना अस्तित्व मांगता हो। *पुरानी तस्वीरों में लोग कितने दुबले लगते हैं। अब तो फूल कर कुप्पा हो गए। ईश्वर कुछ टोना तुम ही कर दो।

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