कल्पनापूरा संग्रह

रचना 614 / 789

तुम सांझा थे मेरे

तुम सांझा थे मेरे और मैं शेष तुम्हारी कुछ द्वंद किसी के हिस्से नहीं आते।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह