कल्पनापूरा संग्रह

रचना 615 / 789

पहाड़ कभी कह नहीं पाते मन l

पहाड़ कभी कह नहीं पाते मन l उनको कहना आता नहीं । रूक जाओ। कुछ देर अतिरिक्त। पर उनकी वेदना चीखती है फिर आना। मैं यहीं हूं। दूर कोई पहाडन भी उतरते पहाड़ संग सरकते उफान को लिखती जाती । पानी से पानी पर अपनी व्यथा कोई परदेसी की कथा । यहीं हूं। तुम आना वादियां भर जाती हैं बिछोह से प्रणय निवेदन से। अतिरिक्त पहाड़ के पास रह जाती है शेष पहाड़न।

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