कल्पनापूरा संग्रह

रचना 646 / 789

मैंने तुम्हारी मुस्कान, बातें, आवाज़ और तस्वीर सलीके से बचा…

मैंने तुम्हारी मुस्कान, बातें, आवाज़ और तस्वीर सलीके से बचाई हुई है...कल्पना में। खुद में मेरी उदासी यूं ही खूबसूरत नहीं है।मेरे दुःख का नूर बेहिसाब है और रहेगा। रहूंगी सदा प्रेमिल। मैंने ईश्वर से कहा ईश्वर मुस्कुरा दिया। कहा और प्रेम करो। बस करती रहो। एक रोज़ मैं तुम और तुम मैं हो जाएंगे।

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