कल्पनापूरा संग्रह

रचना 648 / 789

जब तुम अकेले अपनी धुरी पर शांत और शक्ति पुंज बनकर खड़े होते…

जब तुम अकेले अपनी धुरी पर शांत और शक्ति पुंज बनकर खड़े होते हो तो कुछ आंखें, कुछ हाथ और कुछ मन आपकी ऊर्जा की तरफ़ बढ़ते हैं।ये वो लोग हैं जो आकार लेने का मन रखते हैं और सकारात्मकता को आत्मसात कर सकते हैं। वहीं कुछ लोग दूर कहीं से तुम्हारे ओज को देखते हैं ,जलते हैं और वहीं बुझ जाते हैं। इनका तुम्हारी ओर न आ सकना नियति है ।कुछ लोग जीवन भर उल्टी दौड़ दौड़ते हैं और कहीं नहीं पहुंचते। तुम तक तो हरगिज़ नहीं। ईश्वर दरबान है। इन्हें तुम से दूर रखता है ।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह