कल्पनापूरा संग्रह

रचना 657 / 789

मैंने कभी नहीं कहा तुम्हारे संग चलूँगी।

मैंने कभी नहीं कहा तुम्हारे संग चलूँगी। मैंने हमेशा कहा मैं अंत तक रुकूँगी। प्रेम असल में एक गहरा अवसाद देता है ।इसको उत्सव की तरह मनाना पड़ता है।आपको रूठने और मान जाने का शऊर आना ही चाहिए। किसी हाल न बदलने वाला मौसम हो जाते हैं प्रेमी...धीरे धीरे । एक दूसरे को दिया दुख और दूरी भी दिव्य होने लगती है। नाम सुनते ही याद और भुलावे के फूल एक साथ खिलते हैं अधरों पर। तुमसे प्यार है । तुमको किसी हाल बिसराया नहीं जा सकता। तुम धंस गए हो कंटक से। कोई सिरा बाहर बचा नहीं कि निकाला जा सके। रिसते रहो ।दुखते रहो। आनंद इसी में है प्रेम का। प्रेम का अवसाद मुझे खूबसूरत और तुमको जिंदा रखता है। बने रहो दिलबर। *तस्वीर आज स्कूल से आने के बाद दक्ष ने ली है ।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह