कल्पनापूरा संग्रह

रचना 660 / 789

एक वक़्त के बाद चाहना अपने फीते अपनी गठान ढीली कर देती है...…

एक वक़्त के बाद चाहना अपने फीते अपनी गठान ढीली कर देती है....बस उसी पल आसक्ति प्रेम में रूपांतरित होने लगती है । आसान होना और फिर बस हो जाना इसी को कहते हैं। सादगी को काला तिल क्या लगाना ? क्यूं ही मैला करना।

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