कल्पनापूरा संग्रह

रचना 659 / 789

कितने पुण्य किए होंगे प्रेम ने कि उसे नकारा नहीं जा सकता।

कितने पुण्य किए होंगे प्रेम ने कि उसे नकारा नहीं जा सकता। धिक्कारा नहीं जा सकता। कितना ईश्वर होगा मेरा प्रेम।

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