अपनी हर कविता के साथ
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अपनी हर कविता के साथ मैं बहुत सारी नदी बहा देती हूँ और कुछ पत्थर खुद में रोक लेती हूँ ।इक नयी कविता को आकार देने के लिए न नदी छोटी होती है न पत्थर कम नुकीले । कविता खुश है बेहद खुश। फ़क्र है कि तुमसे कह पाती हूं कि प्रेम है।प्रतीक्षा का कंकड़ बह जाता है। नदी ,हवा या याद में कभी फूल बहता हुए दिखे तो समझ लेना मेरी कविता के अक्षर हैं ।तुम्हारे नाम की महक लिए। लिख कर उड़ा दिए हैं। आबाद रहिए। *तस्वीर आज की है।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह