कल्पनापूरा संग्रह

रचना 663 / 789

असीम सुंदर

तुम कोई आखिरी इंसान नहीं जो सुंदर हो और न मैं कोई पहली सुंदर स्त्री पर जो हमारे बीच अदृष्ट अदृश्य हुआ ,हो रहा और होता रहेगा वह असीम सुंदर है। हमें बस उसे शाश्वत और संपूर्ण रखना है। दूर तक *तस्वीर स्कूल में मेरे कक्ष की है।