पिघल जाने के लिए आंच या ऊष्मा नहीं मन चाहिए।
पिघल जाने के लिए आंच या ऊष्मा नहीं मन चाहिए। दो लोगों के बीच बहुत सारा मन हो तो ही समंदर पनप सकता है। यहां मैं उन दो लोगों की बात कर रही जो आकर्षण और प्रेम का अंतर जानते हों। अक्सर दो अलग अलग कहानियों के किरदारों को एक दूसरे के लिए रास्ता देते हुए ...बनाते हुए देखा है ।ये रास्ते कुछ दूर तक तो बहार का आभास देते हैं पर जब दोनों में से कोई भी थक कर अधिकार मांगने लगता है तो कहानियों में बबूल उग आते हैं। प्रश्नों के बबूल .... जवाबदेही वाले कैक्टस। अनकहा रिश्ता सिर्फ देता ही रहे तब तक ही ज़िंदा रहता है। स्थिरता मांगने वाला अनकहा रिश्ता बस प्रश्न और उत्तर वाली उदासी ही लाता है। उदासीन रिश्ते उम्र कम ही लिखा कर लाते हैं.. बस तीन अक्षर "चाहना" से बने होते हैं ना। झट वाले प्रेमी झटपटअजनबी बन ही जाते हैं ... समंदर लंगर से थोड़े ही बंधता है। धीरे धीरे कहानियां अपने अपने मंच पर थिरकने लगती हैं। रोज़ वाले प्रेमी किरदार एक दूसरे की तरफ पीठ करके खड़े हो जाते हैं। फिर.... स्त्री हमेशा बढ़ जाना पसंद करती है क्योंकि प्रश्न मिटा नहीं सकती।पुरुष ठहर जाना पसंद करता है क्योंकि प्रश्न ढो नहीं सकता। अक्सर सोचती हूँ खूंटी पुरुष के लिए बेहद जरूरी है और डोर स्त्री के लिए बंध जाने के लिए भी उड़ जाने के लिए भी। एक दूसरे को मीलों दूर से ही सही देखते देखते बूढ़ा होते जाना ..... कम इश्क़ है क्या ? हम इश्क़ कम नहीं कम इश्क़ करेंगे। 💕