कल्पनापूरा संग्रह

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मैं जिससे सबसे ज्यादा दुखती हूं उसी को अपने दर्द सांझा करने…

मैं जिससे सबसे ज्यादा दुखती हूं उसी को अपने दर्द सांझा करने के काबिल समझती हूं। न वो मानता है न मैं बाज़ आती हूं। उसको कहती हूं प्रेम के चार मौसम होते हैं....पतझड़ ,सावन ,बसंत ,बहार पांचवां अप्रेम का होता हम उसी में पड़ गए हैं। राख की रस्सी ही है प्रेम.... गले में पहनी भी और बँधे भी नहीं। तस्वीर बस अभी लेज़ी संडे की है। मुस्कान बरसों से जूनी पुरानी

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह