कल्पनापूरा संग्रह

रचना 669 / 789

तुम्हारे साथ मैंने अथक यात्राएं की हैं

तुम्हारे साथ मैंने अथक यात्राएं की हैं आगे भी करूंगी.... कभी मन की कभी मन के विरुद्ध इस विवशता को तुम जाने क्या कहो मैं प्रेम ही कहूंगी।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह