कल्पनापूरा संग्रह

रचना 678 / 789

इक रोज़ हम फिर मिलेंगे

इक रोज़ हम फिर मिलेंगे मुस्कुराएंगे देखेंगे कि आस पास हैं पर एक दूसरे तक पहुंच नहीं पाएंगे। कुछ कह नहीं पाएंगे। याद करेंगे कि बीते दिनों जो पुल टूट गए उनका मलबा इतना भारी क्यों रहा जो उठ नहीं पाया । क्या क्या टूटा प्रेम के सिवा। कभी कभी हम खाली जगहों में चाह कर भी पसर नहीं पाते। तुम को वही खाली जगह दे दी है। *तस्वीर आज की है ....प्रेम पुराना है।

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