कल्पनापूरा संग्रह

रचना 681 / 789

कभी कभी मिलने के लिए नहीं

कभी कभी मिलने के लिए नहीं कुछ पल यूं ही साथ रुककर कहने सुनने के लिए भी हो जाता है प्रेम। मन पहचान लेता है कि यही वह चट्टान है जिसे भेदना है और यही वह प्रहार है जो भेद देगा तुम्हारी हिमशिखा।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह