कल्पनापूरा संग्रह

रचना 680 / 789

रेत का मोह हमेशा से पैरों के लिए था ।

रेत का मोह हमेशा से पैरों के लिए था । वो निर्मोही पैर थे जो समझ नहीं पाए रेत का उनसे लिपट जाना , कुछ देर टिकना और फिर झड़ जाना।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह