कल्पनापूरा संग्रह

रचना 690 / 789

एक रोज़ मुस्कान में जगह देना तुम मुझे।

एक रोज़ मुस्कान में जगह देना तुम मुझे। मैं थक गई हूं होठों पर ठहरे हुए।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह