कल्पनापूरा संग्रह

रचना 714 / 789

शीशे और आईने का फ़र्क कुछ ही आंखें जानती हैं ।

शीशे और आईने का फ़र्क कुछ ही आंखें जानती हैं । यहां प्रेम बहुत है प्रेमी कम । प्रेमिल उससे भी कम।

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