कल्पनापूरा संग्रह

रचना 715 / 789

मैंने जब कभी उसे देखना चाहा और वह न मिला तो मुझे वहां नीले…

मैंने जब कभी उसे देखना चाहा और वह न मिला तो मुझे वहां नीले जंगली फूल उगे मिले... बहुत सारे नीले फूल देर तक उन नीले फूलों को ताकती रही।कुछ देर निहार लेने के बाद मन भी नीला होने लगा। सफ़ेद कागज़ पर नीला मन रखा तो आसमानी कविता बन गई। नीली अनुपस्थिति तुम्हारी कब अक्षर कब शब्द कब भाव कब कल्पना बनी न तुम जानो न मैं। पर नीले फूल उगते रहे दूर बहुत दूर।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह