कल्पनापूरा संग्रह

रचना 720 / 789

स्त्री को कविता बनता हुआ देखा है कभी

स्त्री को कविता बनता हुआ देखा है कभी ? दो उसे उसका प्रेम या दे कर देखो उसे उसका एकांत या फिर दो उसे एक ऐसा घाव जो भर न पाए वो उभर न पाए।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह