कल्पनापूरा संग्रह

रचना 721 / 789

तुम रह रहे हो मुझमें

तुम रह रहे हो मुझमें... जैसे कविता में शब्द शब्द में अक्षर अक्षर में ध्वनि रहती है निर्बाध

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह