कल्पनापूरा संग्रह

रचना 421 / 789

कभी मिले तो

कभी मिले तो कांधे पर सर नहीं ....काश रखेंगे प्रतीक्षा आरोह से अवरोह तक अवरोह से आरोह तक कैसे भी लुढ़के दुखती बहुत है।