कल्पनापूरा संग्रह

रचना 145 / 789

मेरे पास लौटने के लिए तुम्हारा वाला शहर नहीं था और तुम्हारे…

मेरे पास लौटने के लिए तुम्हारा वाला शहर नहीं था और तुम्हारे पास मेरा वाला मौसम ताउम्र एक ही ज़ख्म कब तक धड़कता ? चारागर बदलते रहे ... सांस आती रही। अक्सर हम खिलौना नहीं होते ... पर जाने क्यूं टूट जाते हैं।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह