कल्पनापूरा संग्रह

रचना 149 / 789

कुछ देर तुम्हारे पास इस लिए रुकी कि सीख सकूं कि जाने के बाद…

कुछ देर तुम्हारे पास इस लिए रुकी कि सीख सकूं कि जाने के बाद किस तरह रोका जा सकेगा तुम्हें। मौन में मिल लिया करना मुझसे।मैं रुका मिलूंगा। वहीं ढ़ेर सारी बातें होंगी तुमसे कल्पना। देखो...... मैं अब जा ही नहीं पाती तुमसे। तुम मुझे ढ़ेर सारा जो मिल जाते हो अपने शब्दों की मौन अनुगूँज में । शुक्रिया हमेशा रहेगा ....जाकर भी ना जाने का । किसी रोज़ ऐसा कुछ एक कहानी में लिखूंगी और उसमें ढ़ेर सारी कविताएं टांक दूँगी ।😊😊😊😊 *फरिश्ते होते नहीं हैं हमें बनाने पड़ते हैं.. प्रेम बनकर।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह