एक जोड़ा आंखें करती हैं घर पर इंतज़ार...अपने प्रिय का।
✣
एक जोड़ा आंखें करती हैं घर पर इंतज़ार...अपने प्रिय का। शाम का। कभी कभी ये आंखें उसके प्रिय के साथ खुद भी काम पर निकल जाती हैं। दिन भर खुद भी व्यस्त रहती हैं । शाम को दो जोड़े आंखें कभी साथ साथ... कभी एक के बाद एक घर में प्रवेश करती हैं। इंतजार चाहे ना करती हों पर संग रोजाना खर्च जरूर होती हैं और हैरानी की बात है कि बच भी उतना ही जाती हैं। संग संग घिसना , सपने पूरे करना ... जीना भी प्रेम है।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह