प्रिय
✣
प्रिय... जब भी तुमसे मिलूं ये न देखना कि मैं कैसी हूं या क्या लाई हूं। जैसे मैं नहीं देखती कि तुम कौन हो ... क्या हो या क्या दे सकते हो। हमारी देख काफ़ी हो । एक दूजे का नाम काफ़ी हो। उद्गार काफ़ी हो। बस उस पल हमारे बीच ईश्वर काफ़ी हो।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह