कल्पनापूरा संग्रह

रचना 173 / 789

जहाँ से छूटते हैं हम दोनों वहीं से फिर शुरू होते हैं

जहाँ से छूटते हैं हम दोनों वहीं से फिर शुरू होते हैं.... इसलिए बिंदु बन गए... दो नाम नहीं रहे। *एक रोज़ ... तुम उस तरफ़ खड़े होगे और मैं जिंदगी टाप जाऊंगी शुभरात 💕

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह