कल्पनापूरा संग्रह

रचना 174 / 789

तुम मेरी सबसे फेवरेट उलझन हो

तुम मेरी सबसे फेवरेट उलझन हो जिसमें पड़कर मैं रेशम हुई जाती हूं। दो सिरे खुले हुए... बांधने बंधने को आतुर पर हमारे बीच दो शहर आ जाते हैं.. शहर फिर बात करते हैं ... कविता कहानियां लिखते हैं। और हम...? हम दोनों अपने अपने शहरों से बीच की दूरी और रुके समय को छू कर एक दूसरे को चूमते जाते हैं। उलझन के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। गाल पर दो गड्ढे पड़ जाते हैं।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह