कल्पनापूरा संग्रह

रचना 202 / 789

चाँद की फांक चुभती है बहुत

चाँद की फांक चुभती है बहुत.... उदासी के कोने नहीं होने चाहिए। जिस शख्स में मैं ज्यादा वो कम दिखे और मेरी परछाई में वो ज्यादा मैं कम मुझे वही चाहिए। कम में मैं मानती नहीं ... ज्यादा मैं लेती नहीं। तुम आओ तो सही।

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