कल्पनापूरा संग्रह

रचना 207 / 789

कोई भी शख्स या रिश्ता जो आपमें पानी मिलाता है ... आपको dilu…

कोई भी शख्स या रिश्ता जो आपमें पानी मिलाता है ... आपको dilute करता है उसे बिसरा देना ही अच्छा है। घात एक बार ठीक ... दूसरी बार हार तीसरी बार प्रहार होती है। मन को सन्न कर देने ....उसे मरणासन्न कर देने का हक केवल उसके पास होता है जिसे हम अपना मन देते हैं । जो रक्षक होना चाहिए वही अगर अक्ष से उखाड़ दे तो खुद अपना मन खींच लेना चाहिए। चाहे इस प्रक्रिया में तुम्हारे खुद के हाथ अपने ही खून से कितने भी सन जाएं। छोड़ दें उसे जो ... सुन नहीं सकता , देख नहीं सकता ,महसूस नहीं कर सकता, सोच समझ नहीं सकता। वो प्रेम क्या करेगा जो खिलाड़ी हो संवेदनाओं का। प्रेम अंधा होता है पर इतना भी विकलांग नहीं होना चाहिए कि आप अपना खुद का नाम तक ना ले सकें। जहां आप का आत्म सम्मान या आपकी आत्मा दुखती हो उसे त्याग अगर न भी पाओ तो उसे मौन दो। अमर बेल काट दो। सूखने दो। दूरी दो। भीतर क्या चल रहा है उससे उसे अनभिज्ञ रखो। मौन से बड़ा उत्तर कोई नहीं। मौन से बड़ा कोई बाड़ा नहीं। जिसे मन दिया उसे मौन दे दो। पर इसका कत्तई ये मतलब नहीं कि आत्म को चुप करा दो। अपनी आत्मा को दुगना शोर दो ताकि वो प्रश्न करना ना छोड़े और गाढ़ी रहे। कोई उसे कभी dilute कर ने की सोच भी न पाए। खुद ही को खुदा करें। इससे खुदा भी नाराज़ नहीं होता। साथ खड़ा रहता है। *जो तुम्हें अनदेखा करे उसे पीठ ही दी जानी चाहिए। तस्वीर उसी पीठ की है जो समय रहते दिखा देनी चाहिए।

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