कल्पनापूरा संग्रह

रचना 248 / 789

ज़िंदगी सा गज़ब मसला हो तुम

ज़िंदगी सा गज़ब मसला हो तुम.... हो तब भी न हो तब भी।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह