कल्पनापूरा संग्रह

रचना 259 / 789

कुछ सूख

कुछ सूख..... कुछ आर्द्रता मायने नहीं रखती । विरह मिलन से परे उगते सूखते विलीन होते ये इश्क के पत्ते भूरे ना होने की जिद्द लिए गिरते ही नहीं... जम जाते हैं ।कभी किसी शाख पर कभी किसी हथेली पर कभी किसी मन पर कभी किसी किताब पर प्रेम हमेशा बढ़ना जानता है .... बूढ़ा होना उसके बस की बात ही नहीं। ये बात भी उतनी ही आर्द्र है जितनी बूढ़ी है। ये बस तुम्हारे लिए कह सकती हूं। तुम वही पत्ता हो।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह