कल्पनापूरा संग्रह

रचना 274 / 789

तुम कितनी ही बार मुझसे होकर अनजाने ही गुज़र जाते हो।

तुम कितनी ही बार मुझसे होकर अनजाने ही गुज़र जाते हो। कभी छू कर ....कभी रौंद कर उस समय लगता है प्रेम कितना निरीह है ।पाबंदियों और सलीके की क़ैद में चिड़िया सा तुमको नहीं पुकार सकने का दुःख किसी कांधे किसी.... पीठ पर नहीं लिखा जा सकता। प्रेम को इसीलिए ईश्वर ने देह नहीं बख्शी.... दाह बख्शा तुम्हारी चुप्पी इस लिए भी उदास करती है मुझे कि मैं जानती हूँ उसमें मेरे लिए बहुत सारे उत्तर छिपे हैं और मैं उन्हें बूझ नहीं पा रही हूँ .... मैं इंतज़ार में हूँ.... तुम्हारा इंतज़ार करते हुए मैं थक कैसे सकती हूँ? अपनी ही प्रतीक्षा में तुम्हारी ओर मुख करके खड़ी हूँ। मुझे मुझसे मिलाने मेरे मैं तक मेरे तुम आना😊 अब तुमको उम्मीद के रोशनदान से हटाकर यकीन के आले में धर लिया है। कहाँ हो तुम ?😊 लव यू कहना है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह