कल्पनापूरा संग्रह

रचना 276 / 789

बादल पर पांव है

बादल पर पांव है.... अभी बाज़ार को जाते वक्त पहाड़ी बादल मिले। मैंने कहा बरसो... छिटपुट बरस भी गए। जो प्रेम में मन समझ ले उस से लिपटना बनता है। लिपट गई।

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