कल्पनापूरा संग्रह

रचना 278 / 789

छाया काया से जो मुक्त है ....वही प्रेम है।

छाया काया से जो मुक्त है ....वही प्रेम है। मिल जाना ही मिल जाना है। तुम मिल गए हो मुझमें।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह