कल्पनापूरा संग्रह

रचना 306 / 789

अक्सर हम सुंदर जानकर असुंदर को

अक्सर हम सुंदर जानकर असुंदर को , प्रेम जानकर अप्रेम को, सहज जानकर असहज को छू आते हैं। मांगते कुछ है....और क्या पा जाते हैं। ईश्वर हमारा तोल जानता है। कम में नहीं बिकने देता सच्चा दिल

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