कल्पनापूरा संग्रह

रचना 307 / 789

प्रेम इतने भर में बीत गया कि मैं आती रही पर पहुंच ना सकी।

प्रेम इतने भर में बीत गया कि मैं आती रही पर पहुंच ना सकी। तुम तक। पर तुम सुंदर रहे । हमेशा। मेरे लिए।

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