प्रेम का कोई रंग नहीं ......न ही कोई खनक
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प्रेम का कोई रंग नहीं ......न ही कोई खनक फिर कैसे छोड़ आता है अपनी छाप बताओ न ..... कैसे सुना आता है अपनी चाप प्रेम का कोई आकार नहीं ....न ही कोई गंध फिर कहाँ रख पाता है इतने एहसास बताओ न ..... कैसे दे आता है सगरे आभास प्रेम का कोई पता नहीं .....न ही कोई प्रारूप फिर कैसे सटीक दर पर है धरता अर्ज़ी बताओ न कैसे है करता इतनी मनमर्जी प्रेम का कोई आदि नहीं.... न ही कोई अंत फिर कैसे जो क़तरा है , समुंदर भी है बताओ न जो सामने है , वो कैसे अंदर भी है
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह