कल्पनापूरा संग्रह

रचना 335 / 789

उस दिन खो देने के बाद फिर मैंने सिर्फ़ संभाल सीखी।

उस दिन खो देने के बाद फिर मैंने सिर्फ़ संभाल सीखी। *जाना कि पाने से अधिक मोल देने का है और वो भी उसे देने का जो लौटाने का मन तो रखता हो पर लौटा न सके। *पहचाना कि गिरने से टूटते नहीं उगते हैं। *देखा कि होना होना नहीं होता ... होते रहना होना होता है। *समझा कि चुप हो जाना कितना सारा बोलना है। *सोचा कि क्या होगा कहकर जब आवाज़ पहुंचने से पहले काठ हो जाती हो। *बूझा कि सिर्फ़ ईश्वर का जानना जरूरी है मेरा दुःख । हर सुख वैसे भी श्वेत हो जाता है कुछ पल बाद। *लिखा कि सिर्फ़ प्रेम में ईश्वर और तुमको पाना अक्षरों से ही संभव है। लिखना आराधना है। *माना कि मन के हारे हार है और अपनी जीत को चूमना मेरे हिस्से का मन । मैंने देखा l खूब देखा । देख देख कर सीखा। सीख कर अब जान गई हूं कि अपने मन की खरोंच और घाव अपनी ही हथेली से ढके जा सकते हैं ।अपने ही आंसू से धोए जा सकते हैं। मैं खुद ही मन का लेप बन सकती हूं । बना सकती हूं। मन तजने और प्राण फूंकने का भी जादू मेरा ही है। मन ही मेरे हर दुख को न्यून शून्य कर सकता है बस ईश्वर की देख मेरी तरफ बनी रहे।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह