कल्पनापूरा संग्रह

रचना 371 / 789

मैं थी मैं हूँ

मैं थी मैं हूँ मैं रहूंगी इनके बीच के फासलों में शब्दों का कोलाहल मेरे अस्तित्व का हलाहल भरा था भरा है भरा ही रहेगा और बस इक "कल्पना" होगी निर्वात लपेटे अर्थात समेटे

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह