कल्पनापूरा संग्रह

रचना 378 / 789

हम बुनते बुनते खुल जाते हैं

हम बुनते बुनते खुल जाते हैं एक पश्मीना है पूरा नहीं होता

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह